#मिटू : व्यक्तिगत क्षोभ से सामूहिक रोष का सफर

कार्यस्थल पर होने वाले यौन शोषण के जितने मामले प्रकाश में आते हैं असल समस्या उससे कहीं बड़ी है। दुनिया भर की महिलाएं अनन्य कारणों से इस दमन के खिलाफ आवाज़ नहीं उठाती और चुपचाप इस दमन को सहते जाती हैं। जब कभी महिलाएं इस मुद्दे पर चुप्पी तोड़ती भी हैं तो अक्सर उनसे यह सवाल पूछा जाता है कि उन्होंने पहले शिकायत क्यों नहीं की? शिकायत न करने देने के लिए एक पूरा तंत्र काम करता है, समाज में बदनाम होने का डर, लोगों द्वार शिकायत का मज़ाक बनाया जाना या गंभीरता से न लेना, शिकायत पर कोई उचित कार्यवाही न होना, चुप रहने के लिए परिवार और दोस्तों द्वारा दबाव बनाया जाना और इन सब से बढ़ कर सुरक्षा का हवाला दे कर नज़रबंद कर दिए जाने का डर महिलाओं को चुप रहने पर मजबूर करता है।

महिलाओं ने #मिटू अभियान के तहत हॉलीवुड से ले कर मीडिया और शैक्षणिक समुदाय के शक्तिशाली पुरुषों के खिलाफ आवाज उठाई है पर यह एक वृहद् समस्या का एक छोटा सा कोण मात्र है। इस पूरे प्रक्ररण में एक बात और साफ़ तौर पर दिखने लगी है कि वे कामकाजी महिलाएं जो तुलनात्मक रूप से कहीं अधिक उन्मुक्त मानी जाती हैं, जो कइयों के लिए प्रेरणा स्रोत हैं और कई सामाजिक मुद्दों पर दूसरों की पैरोकारी करती दिखती हैं खुद अपने जीवन में शक्तिशाली पुरुषों के दमन के खिलाफ आवाज़ उठाने में खुद को सशक्त महसूस नहीं करती हैं। ऐसे हादसों से उबरने में महिलाओं को एक लंबा समय लग जाता है और कई बार तो मानसिक क्षति इतनी गहरी होती है कि महिलाएं इससे ताउम्र नहीं उबर पातीं। शारीरिक शोषण, यौन भीति और यौन हिंसा की हर घटना के साथ ही महिला को और दरकिनार कर दिया जाता है और इन घटनाओं को सिर्फ उस एक महिला का व्यक्तिगत मुद्दा बना कर सीमित कर दिया जाता है जबकि ऐसी घटना सिर्फ पीड़ित महिला को ही नहीं बल्कि उस वातावरण में कार्यरत सभी महिला कर्मचारियों पर प्रभाव डालती है और पूरे कार्यस्थल पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

कार्यस्थल पर होने वाली यौन हिंसा का केंद्र शक्ति का वर्चस्व है इसीलिए ज्यादातर मामले महिला कर्मचारियों और उनके वरिष्ठ अधिकारीयों या प्रबन्धकों और निरीक्षकों के बीच घटित होते हैं। इन वरिष्ठ अधिकारीयों, प्रबंधकों और निरीक्षकों को काम के स्वरुप के कारण न सिर्फ अपने कनिष्ठों से अधिक शक्तियां व अधिकार प्राप्त होते हैं बल्कि वे काम की अवधि, उसके नियोजन, लक्ष्य निर्धारण और पदोन्नति सम्बन्धी योग्यता मूल्यांकन के लिए भी जिम्मेदार होते हैं। बहुत कम ही महिलाएं होंगी जिनके साथ कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की कोई भी घटना न हुई हो, लेकिन यह भी सच है कि शोषण के मामले महिला की सामाजिक स्थिति पर भी निर्भर करते हैं। वे महिलाएं जो आर्थिक या समाजिक रूप से कमज़ोर हैं जैसे कि युवतियां, अविवाहित या विधवा महिलाएं और दलित, मुस्लिम, आदिवासी या प्रवासी महिलाएं जिनके संसाधन सीमित हैं और यूनियन तक जिनकी पहुँच सीमित है, उनका शोषण कहीं ज्यादा होता है।

रुपन द्योल बजाज की न्याय के लिए साहसिक जंग

वरिष्ठ प्रशासनिक सेवा अधिकारी रुपन द्योल बजाज का `नामचीन` पुलिस अधिकारी के.पि.एस गिल के खिलाफ यौन शोषण का मामला भारत के न्यायिक गलियारों में एक जाना-माना मुकद्दमा है। सन 2005 में सर्वोच्च न्यायालय ने पंजाब एवं हरयाणा उच्च न्यायलय के आदेशों को मान्य करार देते हुए 1988 में दायर किये गए मामले में फैसला सुनाया जिसके तहत 3 महीने का सश्रम कठोर कारावास, 2 महीने का सामान्य कारावास, तदुपरांत 3 साल की परिवीक्षा और 2 लाख रुपये जुर्माने की सज़ा सुनाई गयी। कारावास में बितायी जाने वाली पूरी अवधि को बाद में सामान्य अवधि में बदल दिया गया और सुश्री बजाज ने 17 साल की लंबी न्यायिक लड़ाई लड़ने के बाद 2 लाख रुपयों को ठुकरा दिया। अपनी जीत के बाद एक प्रेस गोष्ठी को सम्बोधित करते हुए उन्होंने कहा – “यदि शोषित होते हुए मैं उसे [गिल] को अदालत नहीं घसीटती तो कौन घसीटता? क्या आप विश्वास कर सकते हैं कि में उस वक़्त उसकी वरिष्ठ अधिकारी थी, भारतीय सरकार की एक सचिव और वो सिर्फ एक विभाग का अधिकारी फिर भी उसमें यह दुःसाहस था कि वह मेरे साथ ओछी हरकत कर सके।”

हालाँकि वारदात के वक़्त गिल सुश्री बजाज से ओहदे में छोटे थे पर वे उस वक़्त पंजाब पुलिस के महानिदेशक थे जब खालिस्तान आंदोलन के विरुद्ध ऑपरेशन ब्लैक थंडर अपने चरम पर था। सुश्री बजाज ने प्राथमिकी तो दर्ज कि पर उस मामले में कोई जांच नहीं हुई। फिर उन्होंने न्यायिक दंडाधिकारी (जुडिशियल मेजिस्ट्रेट) के पास अर्जी लगाई जिन्होंने जांच के आदेश दिए। इस आदेश के खिलाफ गिल ने उच्च न्यायलय में याचिका दायर की। उच्च न्यायलय ने मामला यह कह कर ख़ारिज कर दिया कि यह भारतीय दंड संहिता के धारा 95 के तहत एक तुच्छ अपराध है और इस मामले को इतना तवज़्ज़ो देने के जरूरत नहीं है। जब बजाज अपनी शिकायत ले कर राज्यपाल एस.एस. राय के पास गयीं तो उन्होंने सलाह दी कि “देश हित में मामले को भूल जाओ।” के.पि.एस गिल को 1989 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया। इस न्यायिक लड़ाई के दौरान सुश्री बजाज पर असहनीय सामजिक और राजनैतिक दबाव बनाये गए लेकिन वे फिर भी डटी रहीं।

रुपण द्योल बजाज की जंग वैसा बदलाव नहीं ला पायी जैसा उन्होंने सोचा था, न ही अन्य न्यायिक संघर्षों से लोगों ने जो कवायद कि उसका कोई खासा असर देखने को मिला है। आज भी महिलाओं के लिए यौन शोषण के मामलों में शिकायत करना आसान बात नहीं है, न ही इन मामलों में लम्बी चलने वाली न्यायिक और सामाजिक लड़ाई आसान हुई है।

तुका राम व अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य मामला (मथुरा मामला) में 1979 में हुए फैसले में यौन सहमति पर गहन विवेचनात्मक चर्चा हुई थी जिसके परिणामस्वरूप हमारे देश के बलात्कार सम्बन्धी कानूनों में बदलाव किये गए मगर आज भी सहमति को ले कर हमारी समझ धुँधली ही है। विधिक गलियारों में भी सहमति की समझ सीमित है। विशाखा बनाम राजस्थान सरकार व अन्य मामले में कार्यस्थल पर घटित मामलों में मालिकों की जवाबदेही तय की गयी थी जिसने अन्तोगत्वा कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से महिलाओं का संरक्षण (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 को जन्म दिया। महाराष्ट्र राज्य बनाम मधुकर नारायण मार्डीकर मामले में 1991 में सर्वोच्च न्यायलय ने यह साफ़ कर दिया था कि “सिर्फ इसीलिए की महिला चरित्रवान नहीं है किसी भी व्यक्ति को उसकी गोपनीयता और निजता भंग करने का अधिकार नहीं मिल जाता है।”

यौन हिंसा के मामलों का स्वभाव ही ऐसा है कि ज्यादातर मामलों में कोई सबूत नहीं होते और इसीलिए यौन हिंसा के मामले मैंने यह कहा- उसने वह कहा की चाल में आगे बढ़ते हैं। इसीलिए एक ऐसे वातावरण में जहाँ पहले से ही शक्ति का संतुलन बिगड़ा हुआ हो वहां यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है की शक्तिशाली पुरुषों की बात को अशक्त महिलाओं की बातों पर तवज़्ज़ो दी जाती है। यहाँ तक कि न्यायिक दंड प्रक्रिया और कार्यस्थल पर जांच समिति यदि हो तो वह भी शक्तिशाली पुरूषों की ही पक्षधर होती है। औपचारिक एवं नीतिगत ढांचे अधिकतर महिलाओं को न्याय दिलाने में विफल रहे हैं, बहुत कम ही महिलाएं होंगीं जिन्होंने इन ढांचों के इस्तेमाल से अपने लिए या अपने कार्यस्थल पर औरों के लिए कुछ सकारात्मक हासिल किया हो।

संस्कृति बनाम उत्पीड़न

तमाम आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक विकास के बावजूद आज भी कई देशों में यह आम तौर पर सुनने को मिलता है कि कुछ जगहों पर किसी फलां प्रकार की हरकत उत्पीड़न नहीं बल्कि संस्कृति का हिस्सा है, अतः मान्य है। इसी समझ के कारण भिन्न देशों में यौन हिंसा से निपटने के कानूनों में भी अंतर है। हालिया #मिटू अभियान में दुनिया भर से आ रहे महिलाओं के बयानों से एक बात तो साफ़ हो चली है कि महिलाओं पर शोषण का तरीका और उनके शोषित अनुभव विश्वभर में एक जैसे ही हैं, देश और संस्कृति के कारण कोई असमानता नहीं है। किसी भी देश या संस्कृति में महिलाएं जबरन उनकी सहमति और निजता के अधिकार का गला घोंटने को सही नहीं मानतीं।

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन ने हाल ही में उत्पीड़न और हिंसा के मसले पर एक शोध पत्र जारी किया है जिसमें 80 देशों का ब्यौरा है, इनमें से 20 देशों में महिलाओं द्वारा यौन हिंसा की वारदात की शिकायत करने पर होने वाले प्रतिकार से बचाव का कोई प्रयोजन नहीं है, 19 देशों में तो कार्यस्थल पर हिंसा की व्याख्या ही नहीं है। दुनिया भर के ट्रेड यूनियनों ने इस साल अंतर्राष्ट्रीय श्रम सम्मलेन में इसी मसविदे के साथ हिस्सा लिया कि कार्यस्थल पर होने वाली हिंसा पर उत्पीड़न के खिलाफ नए और कठोर मानक बनाये जाएं।

#मिटू : व्यक्तिगत क्षोभ से सामूहिक रोष का सफर

#मिटू अभियान के तहत दुनिया भर की औरतों ने शक्तिशाली पुरुषों के खिलाफ सोशल मीडिया पर चुप्पी तोड़ दी और व्यक्तिगत अनुभवों को एक सामूहिक आवाज़ मिल गयी। सोशल मीडिया के स्वभाव के कारण इस आवाज़ को दबाया न जा सका। महिलाओं का रोष और वर्तंमान ढाँचे में न्याय पाने की उनकी चाह ने कार्यस्थल पर होने वाली हिंसा के मौजूदा आंकड़ों का स्वरुप ही बदल कर रख दिया।

महिलाओं के लिए शोषण के खिलाफ आवाज़ उठाने में सुरक्षा का मसला सबसे बड़ा बाधक है। सुरक्षा का यह प्रशन सिर्फ कार्यस्थल तक सीमित नहीं है बल्कि शिकायत करने के बाद यदि महिला को नौकरी से निकल फेंका गया तो जिस सामाजिक सुरक्षा की आवश्यकता महिला को पड़ेगी वह भी अधिकाँश मामलों में नदारद है। कार्यस्थल पर तो फिर भी यूनियन सुरक्षा सुनिश्चित कर सकते हैं पर कार्यस्थल के बाहर उनकी पहुँच सीमित है। यही कारण है की सुरक्षा का भय महिलाओं को कमज़ोर और लाचार कर देता है और यौन हिंसा के मामले पर चुप्पी बनी रहती है।

दिसंबर 2017 में अमरीकी दैनिक न्यू यॉर्क टाइम्स ने एक लेख प्रकाशित किया था जिसका शीर्षक था – “हाउ टफ इस इट टू चेंज अ कल्चर ऑफ़ हर्रास्मेंट? आस्क वीमेन ऐट फोर्ड” यानि कार्यस्थल पर शोषण की संस्कृति बदलना कितना मुश्किल है? जानिए फोर्ड की महिलाओं से। इस लेख में वाहन निर्माता कंपनी फोर्ड की शिकागो इकाई में काम करने वाली महिलाओं के साक्षात्कार प्रकाशित किये गए थे। इन महिलाओं ने बताया था कि कैसे सहकर्मी काम पर इन्हें प्रताड़ित करते हैं और निरीक्षक काम की बेहतर शिफ्ट के लिए इनसे हमबिस्तर होने की मांग करते हैं। फोर्ड में वेतन अच्छा मिलता है और यहाँ काम करने पर महिलाएं अन्य जगहों से तीन गुना अधिक पैसे कमा पाती हैं इसीलिए काम छोड़ कर कहीं और जाने का विकल्प ही नहीं था वे चुपचाप यह शोषण सहती रहीं। फिर नब्बे के दशक में जैसे शिकायतों की बाढ़ आ गयी। फोर्ड को महिलाओं को 220 लाख डॉलर मुआवज़े में देने के आदेश जारी हुए और शैक्षणिक कार्यक्रम भी चलाने पड़े।

फोर्ड में काम करने वाली मियोशी मोरिस ने अपने प्रबंधक के साथ सेक्स करने के लिए मजबूरन हामी भरी। मोरिस की शिफ्ट सवेरे 6 बजे शुरू होती थी, इस समय पर उन्हें अपने बच्चों के लिए कोई स्कूल नहीं मिल रहा था, बच्चों को अकेला भी नहीं छोड़ सकती थीं। रंगाई विभाग के प्रबंधक ने उनसे कहा कि वह उनकी इस मुश्किल को आसान कर सकता है यदि मोरिस किसी छुट्टी के दिन उनके घर आ सकें तो। एक नियत दिन उसने मोरिस को छुट्टी दिला कर अपने घर बुला लिया।
मोरिस कहती हैं, “मैं डरी हुई थी। मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। मेरे छोटे-छोटे बच्चे थे, जिनके देखभाल का जिम्मा मेरे सर था।” इसके बाद उनकी शिफ्ट को ले कर फैक्ट्री में कभी कोई परेशानी नहीं हुई, उन्हें बेहतर काम भी दिया जाने लगा। वे याद करती हैं, “मुझे इतने पैसे और कहाँ मिलते भला?”

वर्ष 2008 के आर्थिक संकट के बाद शैक्षणिक कार्यक्रम बंद कर दिए गए और यौन शोषण की समस्या कार्यस्थल पर लौट आयी। फोर्ड में फिर शिकायतों की लहर उठी और अदालत ने इस बात का संज्ञान लेते हुए कई निरीक्षकों को नौकरी से निकालने और पिड़ित महिला श्रमिकों को 1 करोड़ डॉलर का मुआवज़ा देने के आदेश दिए। इससे यह देखने को मिलता है कि कार्यस्थल पर यौन हिंसा की संस्कृति बदलने के लिए सिर्फ व्यक्तिगत रूप से आवाज़ उठाने या चंद लोगों को सज़ा देने से काम नहीं चलेगा। इस समस्या से लड़ने के लिए महिलाओं को सामूहिक रूप से आवाज़ उठानी होगी और लम्बी अवधि के सोचे-समझे संस्थागत बदलाव करने होंगे वार्ना छोटी-मोटी विजय गाथाएँ दफन होते देर नहीं लगती।

यौन उत्पीड़न महिलाओं की नहीं सबकी समस्या है

अर्थशास्त्री कौशिक बसु ने 2003 में एक शोध प्रकाशित किया था – कार्यस्थल पर यौन हिंसा के आर्थिक और विधिक आयाम (दी इकोनॉमिक्स एंड लॉ ऑफ़ सेक्सुअल हरस्मेंट इन दी वर्कप्लेस) जिसमें उन्होंने बताया है कि यौन हिंसा के उत्पादकता के लक्ष्यों पर वैसे ही प्रतिकूल प्रभाव पड़ते हैं जैसे अतिशय असुरक्षित स्थलों पर काम करने से। उन्होंने अपने शोध से यह भी दर्शाया कि यौन हिंसा का प्रतिकूल असर जन स्वास्थ्य पर पड़ता है और इसके कारण सरकार का स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ता है। अतः यदि केवल मुनाफे के दृष्टिकोण से भी देखें तो यौन उत्पीड़न को कार्यस्थल पर पनपने देना पूरी तरह से बुरा सौदा है, फिर भी लिंग भेद पूंजीवाद का एक अभिन्न हिस्सा है और इसीलिए यौन हिंसा हमारी कामकाजी दुनिया की दुःखद सच्चाई।

यह शायद इसलिए संभव है क्योंकि यौन हिंसा एक पेचीदा मामला है जहाँ पुरुषसत्ता और वर्गसत्ता एक दूसरे में गुथी हुई हैं और एक दूसरे को बढ़ावा देती हैं। ज्यादातर बड़े और शक्तिशाली ओहदों पर पुरुषों का ही राज है। काम की उपलब्धता भी पितृसत्ता की मारी है। इसीलिए दुनियाभर में कम कमाई वाले और देख-रेख या सेवा-सुश्रुषा के काम महिलाओं द्वारा किये जाते हैं। पुरुष महिलाओं पर न केवल सामाजिक बल्कि आर्थिक नियंत्रण भी रखते हैं।

कपड़ा उद्योग में काम करने वाली महिलाएं कहती हैं कि लगातार होने वाली यौन हिंसा के बावजूद वे चाह कर भी अपनी मर्ज़ी से काम नहीं छोड़ सकतीं क्योंकि ऐसा करने पर उनके पति उन्हें कोसेंगे। एक महिला की नौकरी सिर्फ एक नौकरी मात्रा नहीं है वह अपने मालिक के लिए काम करती है, अपने पति और अपने बच्चों के लिए काम करती है। महिला चाहे किसी भी व्यवसाय में हो, उसे निर्णय लेने कोई अधिकार नहीं होता। इस दबाव के स्वरुप भिन्न परिवारों और महिलाओं के ओहदे के हिसाब से अलग-अलग हो सकते हैं पर यह दबाव और महिलाओं की अपने लिए निर्णय ले सकने की शक्तिहीनता नितांत बनी रहती है। आर्थिक और सामाजिक दोनों ही परिधियों में पुरुषों का वर्चस्व महिलाओं के अस्तित्व पर दोहरा प्रहार करता है।

यह सोच कि महिलाओं की कमाई से परिवार नहीं चलता और वे सिर्फ परिवारिक खर्च में दो पैसे जोड़ने के लिए पुरुषों की सहायक हैं कार्यस्थल पर महिलाओं में हीनता का भाव स्थापित करता है और इस धारणा को हवा देता है कि महिलाओं को कभी भी काम से निकाल कर उनकी तुलना में तुलना में ‘उत्कृष्ट’ पुरुष को काम पर रखा जा सकता है। जबकि सच्चाई यह है कि महिलाएं भी जीतोड़ मेहनत करती हैं मगर इस डर के साये में रहती हैं कि कभी भी नौकरी छीन सकती है अतः मूक रह कर नौकरी बचाते हुए अत्याचार सहती जाती हैं।

वह संस्कृति जो कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न करने वालों को बढ़ावा देती है वही पुरुषों में एक-दूसरे का बचाव करने वाली ‘भाईचारे’ की भावना भी प्रगाढ़ करती है। फूहड़ चुटकुले, गन्दी बातें, महिलाओं की कद -काठी, रूप-रंग या पहनावे पर फब्तियां कसना इस संस्कृति का हिस्सा हैं। यह कार्यस्थल को महिलाओं और पुरुषों के दो खानों में बाँट देता है और मजदूर वर्ग को एकजुट नहीं होने देता।

क्या यूनियन मार्गदर्शक हो सकते हैं?

यदि हम कार्यस्थल पर शक्ति की संरचना को बदलना चाहते हैं तो सिर्फ यूनियन ही हमारे मार्गदर्शक हो सकते हैं। पर महिलाएं अपने मुद्दों को लेकर यूनियनों पर भरोसा नहीं कर पाती हैं। महिलाओं के मुद्दे नगण्य बता दिए जाते हैं, उनकी मांगें जरूरी मसलों का हवाला दे कर पछाड़ दी जाती हैं और यदि उनकी शिकायत यूनियन के किसी नेता के खिलाफ हुई तो उन्हें चुप करा दिया जाता है। इसीलिए ऐतिहासिक रूप से यह समझ बनी है कि महिलाएं यूनियन की सिर्फ सदस्य मात्र हैं हक़ीक़त में यूनियन पुरुषों का गढ़ है।

यूनियन भी ‘भाईचारे’ की भावना को बढ़ावा देते हैं ताकि वे सदस्यों को एकजुट रख सकें। यूनियन के सदस्य देर रात तक एक साथ काम करते हैं, सभाएं करते हैं, साथ बाहर घूमने, खाना खाने या मदिरापान करने जाते हैं। महिलाएं इन गतिविधियों में हिस्सा लेने में खुद को असमर्थ पाती हैं। यूनियन की सभाओं और कार्यालयों में काम करने का तरीका भी पुरुषों द्वारा निर्धारित होता है और उन्हीं का वर्चस्व होता है फिर चाहे सदस्यता महिलाओं की ही क्यों न हो। महिलाओं को दिन भर कमरतोड़ मेहनत के बाद घर जा कर चूल्हा-चौका करना होता है, बच्चों और बूढ़ों की सेवा करनी होता है, कपडे-बर्तन धो घर साफ़ सुथरा करना होता है। इसीलिए वे महिलाएं जो यूनियन से जुड़ती भी हैं वे यूनियन की गतिविधियों का हिस्सा नहीं बन पाती हैं। अतः यूनियन भी पुरुष और महिलाओं में विभाजित हो जाता है।

वहीं दूसरी तरफ यह सोच भी बलवान है कि यूनियन का मुखिया कोई ‘पुरुष’ ही होना चाहिए यानि शक्ति और साहस का द्योतक ऐसा व्यक्ति जो पूंजीपति के दमन के खिलाफ खड़ा हो सके। यह अंतर्द्वंद हर यूनियन में मौजूद है और कोई भी गंभीरता से इस पर विचार नहीं करता।

यह अत्यंत आवश्यक है कि जब महिलाएं और पुरुष कार्यस्थल की संस्कृति बदलने के लिए लड़ें तब वे साथ-साथ यूनियन की संरचना बदलने के लिए भी संघर्ष करें। जब यूनियन मजदूरी की लड़ाई लड़ता है तब वह सिर्फ मजदूरी की नहीं अपने सदस्यों और उनके परिवारों के लिए एक बेहतर जीवन की लड़ाई लड़ता है। इसीलिए जब यूनियन किसी महिला पर हो रहे यौन उत्पीड़न के खिलाफ मोर्चा खोले तो उस लड़ाई का भी वृहद् होना जरूरी है। यह लड़ाई सिर्फ आजीविका बचाने की लड़ाई तक सीमित नहीं रह सकती, इस लड़ाई में सबके लिए मुफ्त शिक्षा और उपचार, शिशु की देखभाल, सार्वजनिक यातायात, यूनियन बनाने के अधिकार और यूनियन में अपनी बात रख सकने के हक़ के लिए भी संघर्ष शामिल होना चाहिए। यही वे सामाजिक जरूरतें हैं जो ऐसी आर्थिक और सामाजिक जमीन तैयार करती हैं जहाँ महिलाएं सशक्त हो सामूहिक रूप से उन व्यक्तियों के खिलाफ जंग छेड़ सकती हैं जो उनका दोहन करते हैं और सुनिचित कर सकती हैं की कार्यस्थल महिलाओं और पुरुषों दोनों के लिए बेहतर बने।

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